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Friday, September 19, 2008

हिंदी पत्रकारिता : आत्ममंथन की जरूरत (१)

अरविंद कुमार सिंह
आजादी के बीते छह दशको के दौरान संचार माध्यमों में हिंदी की स्थिति बहुत मजबूत हुई है और कई तरह की चुनौतियों से जूझती हुई हिंदी पत्रकारिता आज तमाम नए कीर्तिमान बना रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के विस्तार के बावजूद हिंदी अखबारों का प्रसार लगातार बढ़ रहा है। चैनलों ने कुछ अखबारों का राजस्व भले प्रभावित किया है,पर बड़े अखबार इससे एक दम प्रभावित नहीं हुए हैं। विस्तार से खबरे जानने का साधन आज भी अखबार ही बने हुए है। चैनलों की संख्या भारत में बढ़ रही है । इनमें सबसे ज्यादा संख्या हिंदी चैनलों की है। देश के 79.1 फीसदी क्षेत्र और 91.4 फीसदी आबादी पर दूरदर्शन की पहुंच है। देश में 21.27 ·रोड़ घरों में टीवी है और इनमें 56 फीसदी में केबल कनैक्सन है।
लेकिन इस चुनौती के बाद भी आखिर कुछ तो वजह होगी कि हिंदी के अखबारों का प्रसार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आजादी के पहले भारत में किसी भी हिंदी अखबार की प्रसार संख्या 30 हजार से ज्यादा नहीं थी। 1996 तक देश के शीर्षस्थ तीन हिंदी दैनिको में पंजाब केसरी जालंधर ( 3.12 लाख) ,पंजाब केसरी दिल्ली ( 3.07 लाख) तथा राजस्थान पत्रिका जयपुर (2।06 लाख) का उल्लेख होता था। पर कुछ ही सालों में विशुद्द क्षेत्रीय माने जानेवाले हिंदी के अखबारों ने राष्ट्रीय अखबारों को भी पीछे छोड़ दिया है। आज देश के 15 सबसे बड़े हिंदी अखबारों की सूची में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर , हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका , पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स, नवभारत, प्रभात खबर, लोकमत समाचार, हरिभूमि, नयी दुनिया, राष्ट्रीय सहारा तथा नवज्योति शामिल हो गए हैं। इनमें से कुछ अखबारों की उम्र दो दशक की भी नहीं हुई है। इतना ही नहीं देश के सर्वाधिक बिक्रीवाले प्रमुख समाचार पत्रों में दैनिक जागरण ,दैनिक भास्कर ,मलयाला मनोरमा, दैनिक थांती,अमर उजाला,इनाडु, लोकमत ,मातृभूमि, हिंदुस्तान ,टाइम्स आफ इंडिया की गणना हो रही है। एनआरएस सर्वे 2003 में 25 संस्करणों के साथ जागरण के पास 1।49 करोड़ पाठक थे जिनकी संख्या 2005 में 2.12 करोड़ हो गयी। दैनिक भास्कर के पाठको की संख्या भी इसी दौरान 1.57 करोड़ से 1.73 करोड़ हो गयी, जबकि हरिभूमि के पाठको की संख्या 66.60 लाख से 84 लाख हो गयी। 1989-90 में मैने अमर उजाला के राष्ट्रीय व्यूरो में जब वरिष्ठ संवाददाता के रूप में जब ज्वाइन किया था तो मेरे ज्यादातर मित्रों ने इस आधार पर इसे ज्वाइन करने से मना किया था कि यह तो पश्चिमी उ.प्र. का अखबार है। दैनिक भास्कर तब म.प्र. का अखबार था और दैनिक जागरण उ.प्र. का अखबार बनने की कोशिश कर रहा था। लेकिन आंकड़े साबित करते हैं कि इन अखबारों ने देश के कई हिस्सों में और विशेष रूप से देहाती और कस्बाई इलाको में अपनी पैठ बनायी है।
हिंदी की हैसियत अब बहुत बढ़ गयी है। भारत में तो आजादी के बाद हिन्दी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई थी पर 10 जनवरी 2006 से विश्व हिंदी दिवस मनाना भी शुरू हो गया है। 21वीं शताव्दी को हिंदी के पत्रकार व लेखक हिंदी व देवनागरी लिपि की शताब्दी बता रहे हैं। 165 विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी में पठन पाठन हो रहा है। बहुराष्ट्रीय कपनियां अपने लोगों को देश के गांवों में माल बेचने के लिए हिंदी सिखा रही है। अमेरिकी लोग हिंदी सीख रहे हैं और काबुल श्रीलंका के लोग भी। कुछ समय पहले भाषाविद् जयंती प्रसाद नौटियाल ने तथ्यों के साथ साबित किया कि हिंदी ही दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाती है। इसे 100 करोड़ लोग बोलते हैं। हिंदी ब्रिटेन में दूसरी सर्वाधि· बोलनेवाली भाषा बन गयी है और दक्षिण एशियाई लोगों ने इसे ही संपर्क भाषा बना लिया है। दुनिया में अगर चीनी तथा अंग्रेजी ताकतवर है तो हिंदी भी कम ताकतवर नहीं है।
बीते तीन दशको में भारत में जनसंचार माध्यमों के तीब्र विकास में सूचना और संचार क्रांति के साथ भूमंडलीकरण और प्रौद्योगिकी की भी अपनी अहम भूमिका है। भारत के हिंदी भाषी इलाको में साक्षरता के बढऩे के कारण हिंदी की पकड़ और मजबूत हुई है। हिंदी इलाका एक बड़ा पाठक , दर्शक या श्रोता ही नहीं बड़ा बाजार भी है इस नाते बहुत संसाधन भी यहां खूब लगाए गए हैं। हिंदी के नाम पर बहुत से प्रकाशन काफी पैसा और समद्दि भी कमा रहे हैं। अंग्रेजी के कई नामी पत्रकारों को हिंदी अखबारों में छपे बिना भोजन हजम नहीं होता। वास्तव में हिंदी अखबारों ने कुलदीप नैयर से लेकर खुशवंत सिंह जैसे लेखको को गली कूचों तक में पहुंचा दिया अन्यथा ये आभिजात्य वर्गो के घरों तक ही सीमित थे। हिंदी के चैनलों में कई अंग्रेजी के पत्रकार पहुंच गए हैं।
चैनलों की चकाचौंध के बीच में हिंदी में ग्लैमर के नाते बड़ी संख्या में युवा पत्रकार आकर्षित हो रहे हैं। गली-गली में पत्रकारिता संस्थान खुल गए हैं। हिंदी के तमाम चैनलों की गलाकाट जंग में आज क्या हो रहा है यह सबको पता है। पर जहां हिंदी चैनलों में अच्छा काम हो रहा है वह अंग्रेजी के पत्रकारों की बदौलत हो रहा है और जहां उमा खुराना जैसा स्टिंग आपरेशन हो रहा है, वह सब हिंदी के अधकचरे पत्रकार कर रहे हैं। कम से कम यही धारणा बनाने की कोशिश तो लगातार हो ही रही है।
चैनल, रेडियो या अखबार में काम करनेवाले पत्रकार वास्तव में एक ही परिवार के अलग अलग हिस्से हैं। पर अगर बारीकी से देखें तो पता चलता है कि हिंदी चैनल में महत्व की जगहों पर अंग्रेजी के ही लोगों का कब्जा हो गया है। जनसंपर्क या ताकत बढ़ानेवाले जितने भी कार्यक्रम हैं वे सभी इन अंग्रेजीवालों के ही पास हैं। हिंदी के पत्रकारों को भले ही यह पता होगा कि कमरवहीद नकवी आजतक की रीढ़ हैं और एसपी सिंह के बाद उनके ही दिमाग से इतना लंबा चौड़ा नेटवर्क खड़ा हो सका , पर दर्शक तो प्रभु चावला को जानता है,जिनका हिंदी में योगदान दस्तखत करने से ज्यादा नहीं होगा। वह सभी विषयों के विशेषज्ञ के रूप में आज तक पर पेश किए जाते हैं। अब अंग्रेजी के लोग तो अंग्रेजी में ही सोचते हैं और वैसा ही सवाल करते हैं। दर्शको को याद होगा कि साक्षात्कार के दौरान ही वह एक बार जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। लेकिन यह हाल यह हाल कई चैनलों का है। जो हिंदी के पत्रकार अखबारों से इस परिकल्पना के साथ गए थे कि अपनी प्रतिभा वह इन चैनलों को चमकाने में करेगें उनकी हालत सांप छछंूदर जैसी हो गयी है।